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Oct 31, 2021

वैरिकोसवेन्स: होमियोपैथी में पायें समाधान

 

वैरिकोसवेन्स: होमियोपैथी में पायें समाधान 

आपने अक्सर ऐसे व्यक्ति देखें होंगे जिनके पैर, पेट आदि  में फूली हुई शिराओं युक्त गुच्छे जैसे संरचना दिखती है, जो कि रक्त शिराओं के फूलकर कर टेढ़े मेढे हो जाने के कारण होता है, जिसे वेरीकोस वेन कहा जाता है|

समान्यतः सभी जानते हैं शिराओं का कार्य रक्त को शरीर के अन्य भागों से हृदय तक ले जाने का होता है, यह कार्य गुरुत्वाकर्षण के विपरीत होता है, इसलिए शिराओं के अन्दर एक दिशा वाले कपाट (वाल्व) बने होते है जिनका कार्य रक्त को शिराओं में नीचे गिरने से रोकना होता है, इन वाल्व में खराबी आने,रक्त का संचय अधिक हो जाने, अथवा कोई अवरोध आ जाने के कारन शिराए फ़ैल जाती हैं, एवं फूलकर टेढ़ी मेढ़ी हो जाती है| 

सामान्यतः शुरुआत में इसके कारण कोई विशेष समस्या उत्पन्न नहीं होती है सिर्फ यह सौन्दर्य समस्या प्रतीत होती है, किन्तु अधिक समय तक यही स्थिति बने रहने पर प्रभावित स्थान में दर्द, झुनझुनाहट, त्वचा का बदरंग होना, एवं घाव (vericose ulcer) आदि समस्याएं उत्पन्न होने लगती है | इसलिए प्राम्भिक अवस्था में ही उचित देखभाल एवं उपचार आवश्यक हो जाता है |

कारण

इस समस्या का कारण पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं है, पर ऐसा माना जाता है कि अधिक रक्त संचय हो जाने के कारण शिराएँ शिथिल होने लगाती हैं, पेट एवं लीवर के लिम्फ चैनल में अवरोध आना भी प्रमुख कारणों में से एक है | 

गर्भावस्था के दौरान वेरीकोस वेन होना सामान्य लक्षण है जो अक्सर प्रसव पश्चात् सामान्य हो जाता है, ऐसा भ्रूण के वजन, हार्मोनल बदलाव, और हृदय द्वारा अतिरिक्त रक्त पम्प करने (गर्भावस्था में हृदय द्वारा भ्रूण के विकास के लिए सामान्य से अधिक रक्त प्रवाह होता है ) के कारण होता है |

लक्षण

कई लोगों के लिए वैरिकोस वेन सामान्य समस्या होती है, जो सिर्फ देखने में अच्छा नहीं लगता है, लेकिन कुछ लोगों को इससे दर्द और असुविधा हो सकती है, इसके लक्षण निम्न हो सकते हैं :

1.   






1. रस्सियों की तरह दिखने वाली मुड़ी, सूजी और फूली हुई नसें, जो गहरी बैंगनी या नीली दिखती हैं |

    2.    पैरों में दर्द, झुनझुनाहट अथवा भारीपन महसूस होना |

    3.    पैरों में एठन, निचले हिस्से में सुजन एवं जलन का अनुभव होना |

   4.    लम्बे समय तक खड़े अथवा बैठे रहने के बाद दर्द होना |

    5.    प्रभावित स्थान में खुजली होना, त्वचा में  गहरे नील अथवा काले रंग के धब्बे दिखना |

6.    पैरों में घाव (ulcer) होना |

बचाव

1.    नियमित टहलना एवं व्यायाम करना चाहिए जिससे कि रक्त का परिसचरण सुचारू रूप से हो सके |

2.    अपने वजन को संतुलित रखें, यदि वजन अधिक है तो उसे कम करने का प्रयास करें | आहार एवं जीवनशैली सम्बंधित नियमित कार्यों में परिवर्तन लायें |

3.    सुविधयुक्त जूते एवं चप्पलों का उपयोग करें, अधिक हील वाले जूतों का उपयोग करने से बचे |

4.    संभव हो तो पैरों को अधिक देर तक लटकाकर न बैठें, बीच में बीच में टहलते रहे एवं थोड़ी देर के लिए पैरो को ऊपर रखें, जिससे कि पैरों का रक्त परिसंचरण सुचारू रहे |

5.    सोते समय पैर वाले हिस्से को थोडा ऊपर रखे |

होमियोपैथी में वैरिकोस वेन्स का समाधान :

होमियोपैथी उपचार लेते समय बीमारी का नाम ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं होता है, बल्कि मरीज के लक्षण ही प्रमुख रूप से औषधि निर्वाचन में सहायक होते हैं |

मरीज के सामान्य लक्षण, पैतृक इतिहास, मानसिक लक्षण, समस्या के बढ़ने अथवा घटने के कारणों कि जानकारी के आधार पर होमियोपैथिक दवाइयां दी जानी चाहिए, यदि मरीज के लक्षणों का भली भांति अध्यन कर उसके समरूप दवा दी जाये तो कोई भी रोग



आसानी से पुर्णतः ठीक किया जा सकता है | वैरिकोस वेन्स के इलाज में उपयोगी दवा के बारे में यहाँ संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है, जो कि चिकित्सकीय निर्देश को नजरअंदाज़ करने के लिए नहीं है, सिर्फ सामान्य जानकारी हेतु है ताकि आमलोग भी होमियोपैथी के प्रति जागरूक हो सके :

हैमामेलिस वैरिकोस वेन्स हेतु उपयोगी दवा है, यह शिराओं की बाहरी आवरण को मजबूत करती है एवं फैली हुई शिराओं को संकुचित करती है, इसका आतंरिक एवं बाह्य उपयोग दोनों ही लाभदायक है, यदि रक्त प्रवाह में कोई अवरोध हो रहा हो तो अन्य औषधि जैसे अर्निका, बेलिस, फेरममेट, पल्सेटिला, लायकोपोडियम आदि आवश्यकतानुसार उपयोग किया जा सकता है, किन्तु इन दवाओं के लिए अन्य लक्षणों पर भी गौर किया जाना आवश्यक है |

 इस प्रकार के केस में इसके जुड़े हुए अन्य पहलुओं पर भी गौर करना आवश्यक है, समान्यतः लीवर, स्प्लीन, युटेरस, पाचन की समस्याएं जैसे कब्ज़ आदि भी वेरीकोस समस्या से जुडी हुई होती है| लीवर के आकार में वृद्धि( Hepatomegali), स्प्लीन में वृद्धि (Splenomegali), का पता लगाया जाना चाहिए| इस प्रकार यदि कोई जुडी हुई समस्या पाई जाती है तो कार्डस ऍम, चेलिडोनियम प्रभावकारी है |रोग से जुडी हुई समस्याओं के निदान से भी शिराए पुनः अपने मूल आकार में वापस आ जाती है |

 

जब भी भी दोनों पैरों में, पेट, अंडकोष, नितम्ब आदि कही भी वेरिकोस वेन्स उपस्थित हो तो व्यक्ति की बीमारी का इतिहास, पैतृक इतिहास, वर्तमान बीमारी के आधार पर उत्पत्ति का कारण पता लगाया जाना चाहिए, यदि यह चिकित्सक द्वारा सुनिश्चित कर लिया जाये तो फिर रोग को आसानी से ठीक किया जा सकता है |


एसिड फ्लौर औषधि इस प्रकार के मामलों में बेहद उपयोगी है, यह वैरिकोस ulcer हेतु भी लाभदायक है, इसका मुख्य लक्षण है मरीज को ठण्ड से आराम मिलता है और गर्म चीजों से, कुछ ओढने से और गर्म हवा से तकलीफ में वृद्धि होती है | साईलीशिया भी इस प्रकार के रोग में कारगर है किन्तु इसका रोगी शीतप्रधान होता है, उसे जरा भी ठण्ड पसंद नहीं होती है, ज्यदातर ओढ़ कर गर्म कमरे में रहना चाहता है |

होमियोपैथी चिकित्सा में लक्षणों की विशेषता अधिक महत्त्वपूर्ण है, आप यह समझ सकते हैं कि लक्षणों के आधार पर ही दवा का चुना जाना आवश्यक होता है | इस प्रकार जटिल रोगों का इलाज भी होमियोपैथी में संभव है | चिकित्साकाल के दौरान मरीज को भी अपने लक्षणों में आने वाले परिवर्तन पर ध्यान देना चाहिए एवं समय समय पर चिकित्सक को भी अवगत करते रहें |

 

डॉ. भूपेंद्र गुप्ता

होमियोपैथिक चिकित्सक एवं सलाहकार

डॉ. गुप्ता होमियोपैथिक चिकित्सालय

कटघोरा, कोरबा , छत्तीसगढ़

मो. नं. – 9993697234  

 

 

 



 

Oct 23, 2021

जोड़ों का दर्द (Rheumatism) और होमियोपैथिक निदान



Rheumatism
एक प्रकार का जोड़ों का संक्रमण हैं जिसमे आम बोलचाल में आर्थराइटिस कहा जाता है | यह संन्य तौर पर जोड़ों में होने वाली सामान्य विकृति है जो उम्र बढ़ने के साथ उत्पन्न होने लगती है, जोड़ों का दर्द और संक्रमण सामन्यतः कुछ दिनों तक रहता है फिर लगभग सामान्य जैसा हो जाता है, परन्तु ऐसा बार बार होते रहता है, दर्द उभरने का कारन अलग अलग व्यक्तियों में भिन्न भिन्न हो सकता है जो मौसम, कार्य की प्रकृति, जीवनशैली, भोजन आदि पर निर्भर करता है |


होमियोपैथी:

एलोपैथिक पेनकिलर कुछ हद तक तो आराम देते हैं, परन्तु यह दीर्घकालीन अथवा स्थायी नहीं होता है , वही लम्बे समय तक दवाइयां लेते रहने के कारन लीवर एवं किडनी में दुष्प्रभाव होने कि संभावना होती है, ज्यदातर लोग अब इस विषय को समझने लगे हैं एवं वैकल्पिक उपचार कि ओर आर्कर्षित हो रहे हैं| दुष्प्रभाव रहित, स्थायी उपचार देने में सक्षम होमियोपैथी फ़िलहाल सर्वश्रेष्ट विकल्प होगा | ज्यदातर लोग सभी प्रकार के इलाज आजमाने के बाद ही होमियोपैथी में आते हैं, ऐसे में उनका रोग काफी हद तक बढ़ चूका होता है, कई दवाइयां लेने के कारन शरीर की क्रिया में भी परिवर्तन आ चूका होता है, इसलिए ऐसी स्थिति में धैर्य के साथ चिकित्सा करना जरुरी हो जाता है, यदि किसी रोग के आरम्भ से ही होमियोपैथी लिया जाये तो रोग गंभीर अवस्था में नहीं पहुचता है एवं उपचार शीघ्र हो सकता है |

इस लेख में जोड़ों के दर्द से सम्बंधित दवाओं का वर्ना किया जा रहा है, जो कि पुर्णतः ज्ञानवर्धन के लिए है ताकि आम लोग भी होमियोपैथी के प्रति अपनी जिज्ञासा शांत कर सकें, बेहतर उपचार के लिए अपने होमियोपैथी चिकित्सक कि सलाह अवश्य लें |

प्रत्येक मरीज के लक्षण अपने आप में भिन्न होते हैं, सभी फैक्टर, मौसम परिवर्तन, भोजन आदि अलग अलग लोंगों को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करते हैं, इसी आधार पर ही होमियोपैथिक दवाओं का चुनाव किया जाता है |

रसटाक्स एक प्रमुख औषधि है जो जोड़ों के दर्द में आत्य्धिक उपयोग की जाती है, यह ऐसे मरीज के लिए लाभदायक है जिसकी तकलीफ देर तक बैठे रहने से बढ़ जाती है, एवं उठने में आत्य्धिक तकलीफ होती है, किन्तु थोड़ी दूर चलने के बाद कुछ् आराम महसूस होने लगता है,, गीला होने, भीग जाने एवं बादल वाले मौसम में मरीज का दर्द बढ़ जाता है | मुख्यतः जकडन एवं घाव जैसा दर्द जोड़ों में महसूस होता है जो चलते फिरते रहने से कम रहता है | यह निचले हिस्सों के दर्द में ज्यादा फायदेमंद है, हालाँकि यह सभी हिस्सों वाले जोड़ों के दर्द, मांसपेशियों के दर्द, पुराने चोट के दर्द में फायदेमंद हैं |


ब्रायोनिया औषधि में जरा भी हिलने डुलने अथवा चलने से दर्द बढ़ जाता है, कई बार मरीज बिलकुल स्थिर बैठा रहता है; हिलने से भी परहेज करता है ताकि उसका दर्द ना बढ़ जाये (रसटाक्स में इसके विपरीत लक्षण है)| इसका दर्द मुख्यतः मांसपेशियों में रहता है, जोड़ वाला हिस्सा गर्म, लाल एवं सुजन लिए हुए होता है, छूने एवं दबाने से भी दर्द बढ़ जाता है | ब्रायोनिया, लेडमपाल, कल्चिकम, नक्स वोम औषधि में भी चलने से दर्द बढ़ जाता है, इन औषधियों को इनके अन्य लक्षणों के आधार पर भी चुना जाता है |

पल्सेटिला औषधि में दर्द की जगह बार बार बदलते रहती है, विभिन्न जोड़ों में अलग अलग समय में दर्द देता रहता है, गर्मी और शाम के समय दर्द का बढ़ जाना एवं ठण्ड से दर्द का कम हो जाना इसका प्रमुख लक्षण है, लेडम दवा में भी ठण्ड से दर्द कम हो जाने का लक्षण है | पल्सेटिला का रोगी दर्द कि वजह से शांत नहीं बैठ पाता है, दर्द के कारन वह इधर उधर टहलने के लिए मजबूर हो जाता है, धीरे धीरे चलते रहने से उसे आराम मिलता है |




काल्मिया औषधि में भी पल्सेटिला की तरह ही दर्द होता है किन्तु इसका दर्द सीने एवं शारीर के उपरी हिस्से में ज्यादा रहता है, ह्रदय रोग से सम्बंधित Rheumatic दर्द होने पर यह ज्यादा फायदेमंद है |

Rhododendron में जरा भी मौसम में परिवर्तन होता है दर्द शुरू हो जाता है या बढ़ जाता है, काफी हद तक यह रसटाक्स के सामान है; आराम करने से दर्द बढ़ता है, किन्तु इसमें ज्यादातर छोटे जोड़ों में दर्द ज्यदा पाया जाता है | हाथ के जोड़ों और उँगलियों के जोड़ों के दर्द में कोलोफायलम आत्यधिक फायदेमंद है |

 

Jun 6, 2021

Hypothyroidism and Homoeopathic Management

 

HYPOTHYROIDISM

 While not generally considered one of the "Hormones Of Youth", thyroid deficiency can increase your risk of age related disorders.Sub-optimal thyroid means sub-optimal metabolism, which translates into weight gain and its associated ills of heart disease, high blood pressure, diabetes and even cancer.

Unfortunately, blood tests only pick up the more frank cases of hypo-thyroidism. The standard blood test criteria is a low T4 and a high TSH (thyroid stimulating hormone). Because of this insensitivity, some doctors have dubbed sub-optimal thyroid as the "much mis-diagnosed malady."

A check list of common hypo-thyroid symptoms follows: 

May 6, 2021

कोविड संक्रमण हेतु लाभदायक होमियोपैथी

 

कोविड संक्रमण काल में बढ़ रही समस्याओं के बीच लोगों में होमियोपैथी दवाईयों के प्रति उत्सुकता  बढ़ी है | सोशल मिडिया में कई तरह की होमियोपैथिक दवाइयां और दावे शेयर किये जा रहे हैं | होमियोपैथी में कई ऐसी औषधि है जो फेफड़े के संक्रमण को कम करके, साँस कि तकलीफ में आराम पहुचाहती है , आक्सीजन  का स्तर सुधार सकती है परन्तु यह बात ध्यान रखा जाना चाहिए कि होमियोपैथी दवाइयां एलोपैथिक की तरह रोग विशेष पर आधारित नहीं होती हैं , यह मरीज के लक्षणों पर निर्भर होती हैं और लक्षणों से समानता रखने वाली औषधि ही व्यक्ति विशेष को लाभ पहुचती हैं | “ होमियोपैथी रोग का नही बल्कि रोगी व्यक्ति का इलाज करती है “ |प्राचीन समय से ही महामारी रोगों के समय होमियोपैथी दवाईयों ने लाभ पहुचाया है | महामारी काल में मौजूद प्रमुख लक्षणों के आधार पर कुछ दवाईयों का चयन करके उपयोग किया जाता है | बीमारी से तेज उबरने के लिए  सही दवाईयों का चयन, सही डोज, उनका उचित  रिपिटिशन अत्यंत आवश्यक है | अतः चिकित्सक की देखरेख में ही दवा का सेवन करें |





हम कुछ होमियोपैथी औषधि के बारे में जानेंगे जो कोविड मरीजों एवं उनके परिजनों हेतु लाभदायक है, जो कि लक्षणों के आधार पर चिकित्सक से सलाह लेकर ही उपयोग करनी चाहिए –

1.  आर्सेनिक एल्बम : यह आर्सेनिक तत्व से बनी औषधि है , इसका मरीज शारीरिक रूप से कमजोर होता है परन्तु शांत नही रहता, घबराहट, बेचैनी, डर आदि ज्यादा रहता है, थोड़ी थोड़ी देर में पानी की प्यास लगती है |  थोड़े काम में ही थक जाता है|

2.  एन्टिम टार्ट : यह एन्टिमोनी, पोटाश लवणों से मिलकर बनती है| इस का प्रमुख लक्षण है- सीने में घडघड़ाहट के साथ कफ रहना परन्तु बहुत थोडा बलगम  निकलता है , जिससे साँस लेने में तकलीफ होती है | साँस की तकलीफ लेटने पर बढ़ जाती है जिसके कारण मरीज उठकर बैठ जाता है |

3.  ब्रायोनिया : यह यूरोप में पाई जाने वाली जंगली औषधि ब्रयोनी से बनती है, यह लंग्स , श्वांस्नाली के श्लेष्मिक झिल्ली के सुखेपन को कम करती है | इसका मुख्य लक्षण सुखी खांसी के साथ छाती में तेज दर्द होना, खांसी के साथ साँस लेने में तकलीफ होना है | मरीज आत्य्धिक पानी पीता है, शांत लेटा रहना चाहता है , थोडा सा भी हिलने डुलने में तकलीफ बढ़ जाती है |

4.  कार्बोवेज : यह लकड़ी के कोयले से बनी दवा है, इसमें ओक्सिजन संचय कि प्रचुर शक्ति होती है | इसका रोगी पंखे कि हवा कि बहुत इच्छा करता है, छाती में कफ रहता है पर दुर्बलता के कारन निकल नहीं पाता है, रोगी अत्यधिक कमजोरी महसूस करता है, खांसते खांसते दम घुटने लगता है, शवांस तकलीफ के रोगियों को इसके उपयोग से जल्दी आराम मिल जाता है |

5.  फास्फोरस : ब्रांकाइटिस, प्लुराइटीस, न्युमोनिया, तपेदिक आदि में खांसी की प्रमुख दवा है, मरीज को छाती में बोझ महसूस होता है, इसलिए सांस लेने में तकलीफ होती है , रोगी हर साँस के साथ कराहता है, वह खांसी रोके रहता है, क्योंकि खांसने से छाती में दर्द होता है , मरीज बर्फ की तरह ठंडा पानी मांगता है | इसका रोगी शारीरिक रूप से दुर्बल हो जाता है |

6.  एस्पिडोस्पेर्मा : यह दक्षिण अमेरिका, स्पेन में पाया जाने वाला एक वृक्ष ( Quebracho) से तैयार औषधि है , यह फेफड़े के श्वांस केन्द्रों को उत्तेजित करती है , यह आक्सीकरण में वृद्धि करती है, परिश्रम करने से श्वांस फूलना इसका मुख्य लक्षण है, ब्लड यूरिया बढ़ जाने के कारन और हृदय रोगियों के श्वांस तकलीफ में ज्यादा लाभदायक है |

7.  कोका : यह पर्वतारोहियों की दवा मानी जाती है , बेचैनी, घबराहट,साँस में तकलीफ और नींद ना आना इसका मुख्य लक्षण है |ऐसे मनुष्य जो शराब और तम्बाखू अधिक सेवनकरते  हैं, वह पुरे तौर पे साँस नही ले पाते हैं व हांफते हैं | यह बूढों एवं शराबियों के सांस तकलीफ हेतु उपयुक्त है |

8.  जस्टिसिया एडाटोडा: इसे वैद्य्माता या वशाका के नाम से भी जाना जाता है , इसका उपयोग आयुर्वेद. होमियोपैथ एवं यूनानी में किया जाता है | सर्दी-जुकाम, खांसी की प्रत्येक अवस्था में लाभदायक है, मरीज की जीभ सुखी और ठन्डे पानी की प्यास रहती है| फेफड़ों में दर्द जो छाती के आर-पार जाता है, खांसते समय शारीर कांपता है , त्रीव श्वान्स कष्ट के साथ सुखा, पीला खून मिश्रित बलगम आता है | बाई और लेटने में तकलीफ बढ़ जाती है |

9.  ब्लाटा ओरिएंटेलिस : यह कोकरोच से तैयार दवा है , दमा के लिए विशेष औषधि है, विशेषकर यह फेफड़े के संक्रमण से सम्बंधित श्वांस तकलीफ हेतु उपयुक्त दवा है | जब तकलीफ ज्यादा रहे तो मदर टिंचर का उपयोग करना चाहिए , स्थिति संभलने पर अधिक पॉवर का उपयोग करना चाहिए |

 

होमियोपैथी में और भी कई अच्छी औषधि है जो कोविड लक्षण वाले मरीज हेतु लाभदायक है , सभी का विवरण देना संभव नहीं है, होमियोपैथिक चिकित्सक के सलाह से आप औषधियों का सेवन करें| यह सभी आयुवर्ग, पुरुष, महिलाओ के लिए सुरक्षित है | पोस्ट कोविड समस्याओं हेतु भी होमियोपैथी औषधि अत्यंत लाभदायक है |

 

-      डॉ भूपेंद्र गुप्ता

Sep 4, 2015

Urethral stricture and its Homoeopathic Treatment

💢Urethral stricture treatment with Homeopathy:


Homeopathy is constitutional and conventional treatment in which main aim is to relieve the complaints in mild, gentle and permanent way. Person to be treated mentally, emotionally and physically, as a whole, which improves the health and living style. In urethral stricture treatment, for allopathy there is no medical treatment instead of surgical interventions which leaves some complications. But in homeopathy there is wide range of medicines are there to prescribe, according to the totality of the complaints.


Advantages and aims of Homeopathic treatment are,

Ø  Flow of the urine improves

Ø  Associated complaints like pain, swelling relieved.

Ø  Urethral stricture due to injury or hurts is treated with root cause.


Ø  Urethral stricture due to urinary tract infections or gonorrhoea like STD’s are treated with homeopathic medications which relieves the stricture complaints.

Ø  Prostatic problems or other complaints which causes urethral stricture are treated with homeopathy which successfully relieves the complaints.

Ø  It eases the flow of urine, dribbling of urine and urine retention.

Ø  It acts on urinary muscles and membranes to avoid further progression and complications of complaints.

Ø  It will reduce or prolong the chances of recurrence of urethral stricture.

Ø  Homeopathy relieves the complaints after dilations and other surgical procedures.

Ø  Side effects of other conventional treatments or surgical procedures are treated with homeopathy without any side effects. 

Apr 14, 2013

DIPTHERIA AND HOMOEOPATHIC MANAGEMENT


DIPTHERIA

Diphtheria (Greek διφθέρα (diphthera) "pair of leather scrolls") is an upper respiratory tract illness It is characterized by sore throat, low fever, and an adherent membrane (a pseudomembrane) on the tonsils, pharynx, and/or nasal cavity.

CAUSATIVE ORGANISM: -

Corynebacterium diphtheriae, a facultative anaerobic, Gram-positive bacterium. Diphtheria is a contagious disease spread by direct physical contact or breathing the aerosolized secretions of infected individuals

SYMPTOMS:-

The symptoms of diphtheria usually begin two to seven days after infection. Symptoms of diphtheria include

1.       fever of 38°C (100.4°F) or above,

2.        chills, fatigue,

3.       bluish skin coloration,

4.       sore throat, hoarseness,

5.       cough,

6.        headache,

7.       difficulty swallowing, painful swallowing,

8.        difficulty breathing, rapid breathing,

9.        foul-smelling bloodstained nasal discharge and

10.    lymphadenopathy.

Apr 7, 2013

WATER RETENTION


WATER RETENTION

OUR BODY HAS CONSISTED OF 70-80 % OF WATER. WHEN IT REDUCED UPTO 50-40% THEN BRAIN STARTS TO CONSUME WATER IN OUR BODY THESE CONDITION IS CALLED WATER RETETION.

Up to 70% of our body is water:

·         Muscle is made up of approximately 75% water

·         Fat consists of about 50% water

·         Bones are made up of about 50% water

Causes:-

·         Consumption of salt more than 2gm/day, excess amount of salt need large amount of water.

·         Consumption of excess sweet dishes also require large amount of water.

·         Lac of sleep, due to sleeplessness tissue cannot repair well , these condition also consume water

·         Some antibiotic and painkiller medicines

·         Women also may be suffer during menstrual period

 

Prevention:-

The following self-help precautions may reduce the signs and symptoms of water retention for some people:

·         Cut down salt consumption.

·         If are overweight, to lose weight.

·         Do regular exercise.

·         Raise the legs several times per day to improve circulation.

·         Wear supporting stockings if the water retention occurs in your lower limbs.

·         Not to sit/stand still for too long.

·         Get up and walk about regularly when travelling by car, train, boat or plane.

·         Avoid extremes of temperature, such as hot baths, showers, and saunas. Dress warmly if it is cold.

·         Massage - if the affected area is stroked firmly in the direction of the heart it may help move the fluid. It is important that the hand movements do not cause pain. A qualified masseuse or physical therapist will know how to do this more effectively.

 

CLINIC

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Dr. Bhupendra Gupta

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Dr. Gupta is a dedicated homoeopathic physician for his duty and has keen interest whatever he do. As a physician he is very kind and take much interest to listening patient empathetically. He uses latest method of selecting appropriate medicine for fast and stable result. You may ask any health related issue in this blog , email , phone call or you can contact Dr. Gupta personally.